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Monday, January 25, 2016

राधाजी के नाम की महिमा ।। Radha Naam ki Mahima.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, परम प्रिया श्री राधाजी के नाम की महिमा का गान करते हुए स्वयं हमारे प्रियतम श्री कृष्ण कहते हैं । किसी भी व्यक्ति के श्रीमुख से जिस समय मैं "रा" अक्षर सुन लेता हूँ उसी समय उसे अपना उत्तम प्रेमाभक्ति का दान कर देता हूँ ।।

जैसे ही कोई "धा" अक्षर का उच्चारण करे तब तो मैं मेरी प्रियतमा "श्रीराधाजी" का नाम सुनने के लिये उसके पीछे-पीछे ही चल देता हूँ । मुझे मेरी समस्त शक्तियों की प्रतिक मेरी परम प्रियतमा "श्रीजी" मुझे इतनी प्यारी हैं, कि उनका नाम लेनेवाले को मैं अपना सर्वस्व दे देता हूँ ।।

ऐ मेरे प्यारे ये तेरी नजरों का करम है, जो हम जिंदा हैं । ये तेरी मुरली का करम है, जो हमें तेरी यादों में रखती है । ये तेरे अधर रस की कृपा है, जो हमारे अश्क रुकते ही नहीं ।।
वाह रे कान्हा तेरा करम, जब से तेरे भक्ति का रस पिया, मेरी कीमत है कि कम होती ही नहीं है ।।

।। जय जय श्री राधे ।।

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।। नमों नारायण ।।

Friday, December 4, 2015

हे मन मुरख भगवान के श्री चरणों की भक्ति कर ।। Bhakti Ki Parakashtha.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, बिनय पत्रिका में गोस्वामी जी कहते हैं, कि भगवान की भक्ति को, जो सम्पूर्ण ऐश्वर्यों का दाता है, छोडकर मानव संसार के लुभावन में फँसा हुआ है ।।

ज्ञान-वैराग्य, धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य शिव ! सानुकूलं ।।
तदपि नर मूढ आरूढ संसार-पथ, भ्रमत भव, विमुख तव पादमूलं ।।८।।

अर्थ:- गोस्वामी जी कहते हैं, कि हे मन ! ज्ञान, वैराग्य, धन, धर्म की सिद्धि, सौभाग्य और कल्याण सभी कुछ परमात्मा के श्री चरणों की भक्ति से सहज ही प्राप्त हो जाता है ।।

फिर भी कुछ मूढ़ मनुष्य संसार के लुभावने दृश्यों के पीछे भगवान के श्री चरणों की भक्ति से विमुख होकर भटकते रहते हैं ! अत: हे मन तूं कदापि ऐसा ना करना ।।

।। नारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

Sunday, October 11, 2015

सिद्धान्तवादी व्यक्तित्व से ही जीवन के हर तरह की पूजा-अर्चना-बन्दना-भुक्ति और मुक्ति सब सिद्ध हो जाती है ।। Theorists Personality are all proven.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, आज बहुत दिनों के बाद बठे हुए एक कहानी याद आ गयी तो सोंचा आपलोगों के साथ उसी के माध्यम से अपनी पुरानी यादें भी ताजा कर लूँ । बंधुओं, हम मनुष्यों की गति भी बड़ी न्यारी है । थोड़ी सी कुछ मिल जाय तो जैसे लगता है, अब हमसे बड़ा कोई है ही नहीं । लेकिन हम अपने ही बनाये इस सांसारिकता के भँवर में ऐसे उलझते चले जाते हैं, कि अन्तिम में हाथ तो कुछ लगता नहीं अपितु पछता-पछताकर प्राण जाता है ।।
ठीक ऐसी ही एक कहानी मैंने अपने बचपन में कहीं सुना था, आज याद आ गया तो सोंचा आपलोगों से भी शेयर करूँ । एक कौआ था, एक दिन भोजन की तलाश में भटकते हुए देखा कि नदी में एक हाथी की लाश बही जा रही थी । कौआ तो अत्यन्त प्रसन्न हो उठा, तत्क्षण उस पर आकर बैठ गया । अपनी इच्छानुसार मृत हाथी का मांस खाया, नदी का जल पिया, और उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए को परम तृप्ति का आभास हुआ ।।
आनन्द मग्न कौआ सोचने लगा, अहा ! यह तो अत्यंत ही सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कोई कमी नहीं है । फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं ? अपने लिये तो यही व्यवस्था अनुकूल है । कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक आनन्द मनाता रहा । भूख लगने पर वह उस लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता । अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहारी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह कौआ आनन्द विभोर होता रहा ।।
आखिर में एक दिन वह बहती हुई नदी अपने अन्तिम गन्तब्य महासागर में जा मिली । वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हो गया था । सागर से मिलना ही किसी भी नदी का चरम लक्ष्य होता है, किंतु उस दिन उस लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई । चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय । सब ओर सीमाहीन अनन्तानन्त खारी जल-राशि हिलोरें ले रही थी ।।
बेचारा कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब दिखाता रहा । परन्तु उस अनन्त महासागर का कोई ओर-छोर उसे कहीं नजर आ नहीं रहा था । आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर एक दिन वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर ही गया । आख़िरकार एक विशाल मगरमच्छ ने उसे निगल लिया इस प्रकार शारीरिक सुख में लिप्त एक दिशाहीन जीव का भयंकर अन्त हो गया ।।
Swami Dhananjay Maharaj.
मित्रों, हमारी आपकी भी गति कुछ अलग नहीं है । इस दिशाहीन कौए की भाँती कहीं हम भी भटक तो नहीं गए हैं विषय सुख में ? ये हमें स्वयं को विचार करना है-सोंचना है । अक्सर हम मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह ही होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति समझ बैठता है । हमें अपने लक्ष्य को बड़ा बनाना होगा, जिसमें आपसी भाईचारा, आपसी प्रेम-सौहार्द्र, सामाजिक शांति के साथ ही अपने जीवन को सिद्धान्तवादी बनाना होगा । इतने से ही हर तरह की पूजा-अर्चना-बन्दना-भुक्ति और मुक्ति सब सिद्ध हो जाएगी ।।
 
 

Sunday, October 4, 2015

अथ श्रीवेङ्कटेशनिध्यानम् ।। Shri Venkatesha Nidhyanam.

Shri Venkatesha Nidhyanam. श्रीवेङ्कटेशनिध्यानम् ।।
ईशानां जगतोऽस्य वेङ्कटपतेर्विष्णोः परां प्रेयसीं
तद्वक्षस्स्थलनित्यवासरसिकां तत्क्षान्तिसंवर्धिनीम् ।
पद्मालङ्कृतपाणिपल्लवयुगां पद्मासनस्थां श्रियं
वात्सल्यादिगुणोज्ज्वलां भगवतीं वन्दे जगन्मातरम् ॥ १॥

श्रीवेङ्कटेशदयितां श्रियं घटकभावतः ।
समाश्रित्य वृषाद्रीशचरणौ शरणं श्रये ॥ २॥

श्रीमन् शेषगिरीश ते पदयुगे मञ्जीरसंराजिते
सक्तं मानसमस्तु मे तव शुभे जङ्घे सुजान्वञ्चिते ।
रम्भाकान्तिहरोरुकाण्डयुगलीं प्राप्तं कटीं सेवते
काञ्चीनूपुरकिङ्किणीपरिचितां पीताम्बरालङ्कृताम् ॥ ३॥

नाभीपङ्कजतुन्दबन्धनलसद्दिव्योदरापाश्रयं
पद्माकौस्तुभहारमाल्यसुभगां वक्षस्स्थलीं गाहते ।
सर्वाभीष्टवरप्रदानकटिबन्धाब्जाग्र्यचक्रोज्ज्वलैः
हस्तैः श्लिष्टमनल्पभूषणयुतैः कण्ठं समालम्बते ॥ ४॥

मुक्तारत्नविराजिकुण्डललसद्गण्डं सुबिम्बाधरं
नासाशोभि दयार्द्रलोचनयुगं सुभ्रूर्ध्वपुण्ड्रोज्ज्वलम् ।
वक्त्रं रत्नललाटिकापरिलसत्फालं सतृष्णं पिबत्
मौलौ रज्जति माल्यशोभिनि महारत्नाभिषेकोज्ज्वले ॥ ५॥

भूयो वक्त्रमनुप्रसर्पति ततः कण्ठावसक्तं भुजैः
श्लिष्टं वक्षसि पद्मया परिचिते लग्नं पुनर्मध्यमम् ।
कट्यूरुद्वयजानुषु प्रविततं जङ्घावसक्तं पदोः ।
प्राप्तं तिष्टति तत्र गात्रसुषमासक्तं वृषाद्रीश ते ॥ ६॥

 ॥ इति श्रीवेङ्कटेशनिध्यानम् ॥

Tuesday, September 15, 2015

Shri Venkateshwara Ashtakam. अथ श्रीवेङ्कटेशाष्टकम् ।।

Shri Venkateshashtakam. अथ श्रीवेङ्कटेशाष्टकम् ।।


ॐतत्सदिति निर्देश्यं जगज्जन्मादिकारणम् ।
अनन्तकल्याणगुणं वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ १॥

नतामरशिरोरत्न श्रीयुतम् श्रीपदाम्बुजम् ।
प्रावृषेण्यघनश्यामं वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ २॥

मोहादिषडरिव्यूहग्रहाकुलमहार्णवे ।
मज्जतां तरणीं नॄणां वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ ३॥

नाथं त्रिजगतां एकं साधुरक्षणदीक्षितम् ।
श्रीशेषशैलमध्यस्थं वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ ४॥

राजद्राजीवपत्रश्रीमदमोचनलोचनम् ।
मन्दहासलसद् वक्त्रं वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ ५॥

यन्मुखेन्दुस्मितज्योत्स्ना भूयसीं तमसां ततिम् ।
विधुनोति प्रपन्नानां वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम्॥ ६॥

नान्तस्य कस्यचिद् वाक्यं शब्दस्यानन्य वाचिनः ।
ब्रह्मारुद्रेन्द्रजनकं वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ ७॥

यद्वक्षःस्थलमध्यास्य भाति श्रीरनपायिनी ।
तडिल्लेखेवाभ्रमध्ये वन्दे श्रीवेङ्कटेश्वरम् ॥ ८॥

वेङ्कटेशाष्टकमिदं नरकण्ठीरवोदितम् ।
यः पठेत् सततं भक्त्या तस्मै विष्णुः प्रसीदति ॥

।। इति श्री वट्टेपल्ले नरकण्ठीरव शास्त्रि विरचितम् श्री वेङ्कटेशाष्टकं समाप्तम् ।।

 Swami Dhananjay Maharaj

Monday, August 24, 2015

काँवर यात्रा एवं शिवपूजन का रहस्य एवं फल ।। Kanvar Yatra & Shiva Poojan Secret.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, श्रावण-मास प्रारम्भ होते ही चारों तरफ भगवान भोलेनाथ के भक्तों द्वारा भगवान शिव का गुणगान प्रारम्भ हो जाता है । अनादि काल से यह महीना आशुतोष, औढरदानी, बाबा भोले नाथ का है । भगवान शिव का ही एक ऐसा परिवार है जिसमें सबकी पूजा होती है । भगवती जगदम्बा जो साक्षात् उमा भवानी हैं, उनकी पूजा दो बार होती है – चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में । गणेश जी महाराज तो हर चतुर्थी को याद किये जाते हैं पर भाद्रपद की कृष्ण चतुर्थी को उनका विशेष प्रादुर्भाव महोत्सव मनाया जाता है ।।

पूर्व-पश्चिम में तो नहीं, पर दक्षिण भारत में देव सेनानायक कार्तिक स्वामी को "मुरुगन स्वामी" के नाम से पूजा जाता हैं, उनके बड़े-बड़े भव्य समारोह किये जाते हैं । यहाँ तक कि इस संसार में भगवान शंकर की महिमा से उनके वाहनों और गणों तक की भी पूजा होती है । वीरभद्र एवं भैरव तक की पूजा सर्वत्र होती है । सदाशिव का वाहन नन्दी (सांड़) भारतीय संस्कृति में अत्यंत आदरणीय एवं पूजनीय है । कोई किसान भी उसे गाड़ी या हल में प्रयोग नहीं करता है । भगवती का वाहन सिंह भगवती के साथ ही पूजा जाता है । राजस्थान की कर्णी माता मन्दिर में चूहों का स्थान सर्वविदित है । भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर तो साक्षात् ब्रह्मचर्य का प्रतीक है जिसका पंख भगवान श्रीकृष्ण स्वयं धारण करते है ।।

नाग पंचमी को हम सनातनी लोग नागराज की पूजा करते हैं और उसके लिये दूध चढ़ाते हैं । भगवान सदाशिव के सिर पर विराजमान भागीरथी गंगा तो साक्षात् मोक्षदायिनी हैं ही जिनकी पूजा जन-जन के द्वारा की ही जाती है । चन्द्रमा कलंकी और अपराधी होते हुये भी शिव-सान्निध्य के कारण करवा-चौथ को सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा पूजा जाता है । भगवान शंकर के नेत्र में रहने वाले सूर्य की उपासना तो प्रातःकाल हर सनातनी व्यक्ति अर्घ्य दान द्वारा करता है जो आयुष्य और नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला है । भगवान महेश्वर के मध्य नेत्र में रहने वाले अग्नि की महत्ता तो सबको ज्ञात ही है ।।

मित्रों, हमारे यहाँ यज्ञ में अग्नि देवता का आवाहन एवं पूजन विधिवत् किया जाता है । शिव के अश्रु स्वरुप रुद्राक्ष की भी पूजा होती है । हम नाद-ब्रह्म रूप डमरू और भव-भंजक त्रिशूल की भी पूजा करते हैं । नागा-लोग नागफनी एवं खप्पर की भी पूजा करते हैं । परमहंस सम्प्रदाय में तो धूनी एवं भस्म-पिण्डी की भी पूजा की जाती है । शम्भु के सान्निध्य में ऐसा कौन है जिसकी पूजा नहीं होती है अथवा की जाती है ? भगवान शंकर की पूजा से सब देव प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि शंकर देवों के देव महादेव हैं । हर प्राणी शिव की आराधना करता है एवं सकता है ।।

पहले तो सम्पूर्ण-विश्व में शिव मात्र की ही पूजा होती थी, किन्तु बाद में कलिकाल के प्रभाव से मतवादों के चक्कर में पड़कर मनुष्य शिव-पूजा से विमुख हो गया । आज भी प्राचीन खुदाईयों में शिवलिंग का मिलना इस बात का प्रमाण है । भले ही नाम एवं रूप अलग हों पर है तो वह शिव ही । सनातनी हिन्दु, जैन, सिख, निराकारी आदि सब शिव की ही पूजा करते थे और आज भी तरीका भले ही अलग हो शिव की ही पूजा करते हैं । सगुण-साकार की पूजा सरल एवं निर्गुण-निराकार की उपासना शास्त्रों ने कठिन बतलायी है । ॠषियों ने ऐसी विधा की खोज की जिससे सहजता से शिव की प्राप्ति हो जाये और हम परम शिवतत्व को जानकर मोक्ष के अधिकारी हो सकें ।।

भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रेम जलधारा से है । सारे देवता नाना प्रकार की भोग सामग्रियों से संतुष्ट होते है- जैसे गणेशजी को मोदक, कृष्ण को माखन-मिश्री, देवी माँ को हलवा तो भैरव जी को सोमरस । लेकिन हमारे भोले बाबा तो केवल जल चढ़ाकर ‘‘बं बं’’ करने से ही प्रसन्न हो जाते हैं । शास्त्र भी कहता है – ‘‘जलधाराप्रियः शिवः’’। बाबा का पूजन भी सबसे सरल है जिसमें मिट्टी की मूर्ति यानी पार्थिव लिंग बनाया और गंगा से जल भर कर लाये एवं उसे चढ़ाकर ऊपर से आक-धतूरा-बिल्व पत्र चढ़ा दिये, इसी से शिव अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं ।।

स्वय महेशः श्वसुरोनगेशः सखा धनेशस्तनयो गणेशः ।
तथापि भिक्षाटनमेव शम्भुर्बलीयसी केवलमिश्वरेच्छा ॥

भगवान शिव सर्वदा स्वतंत्र हैं, वह चाहें तो एक पल में ही सृष्टि का प्रलय कर देवें । परन्तु अकारण करूणा वरूणालय हिमालयवासी कैलासी किसी का भी उद्धार कर देते हैं । ये कब या कैसे प्रसन्न हो जायेगें, यह कोई नहीं कह सकता है । बड़े-बड़े देवता भी जिनकी चरण रज के लिये लालायित रहते हैं, वे भोलेनाथ अपने भक्तों के वशीभूत हैं । प्रेम की डोर में अघोर बंधते देर नहीं करते । आज तक भगवान शिव ने आजतक किसी को खाली हाथ नहीं लौटाया ।।

भगवान विष्णु की भक्ति के वशीभूत होकर उन्हें अपना चक्र और धनुष दे दिया । कुबेर को सारे ऐश्वर्य देकर धनाधीश बना दिया । इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दे दिया । जिसने जो भी माँगा उसे बाबा ने एवमस्तु कर दिया । कभी-कभी स्वयं भी वरदान देने के चक्कर में भस्मासुर से परेशान हो उठे और दिव्य लीला दिखा दी । ऐसे भोलेनाथ को ही सावन में शिवरात्रि के दिन शिवभक्त "काँवर से जल" लेजाकर चढ़ाते हैं ।।

प्रत्येक राज्य में लोग अपने-अपने नजदीकी सिद्ध शिवपीठ पर किसी पवित्र नदी का जल लेजाकर चढ़ाते हैं । जब भी कोई शिवभक्त काँवर संकल्प करके उठाता है तभी से उसकी शिवभक्ति आरम्भ हो जाती है । कई भक्त तो गोमुख तक भी जाते है और वहाँ गंगा स्नान करके अपने तन-मन को पवित्र बनाकर, भभूत लपेट कर, पवित्र-घट में संकल्पपूर्वक गंगा-जल भरकर उसकी पूजा करते हैं । फिर "हर हर महादेव" का जयकारा लगाकर काँवर उठा लेते हैं । इन परिस्थियों में हर काँवरिया एक तपस्वी होता है, अतः उसे तपस्वी के कठोर नियमों का पालन करना आवश्यक होता है ।।

सबसे पहले भगवान शंकर को काँवर का जल किसने चढ़ाया यह तो एक रहस्य ही है । परन्तु पुराणों और लौकिक कथाओं के माध्यम से पता चलता है कि जिस समय सुर-असुर मिलकर समुद्र मन्थन कर रहे थे उसी समय महाकाल की ज्वाला जैसा धधकता हुआ हलाहल विष प्रकट हुआ । उस काले कालकूट से हर कोई प्राणी भयभीत हो उठा, देवता तक पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाये । भगवान विष्णु का तो रंग ही उसकी ज्वाला से काला हो गया और वे श्यामसुन्दर बन गये । तब देवताओं और दानवों की सभा में भयंकर कोलाहल हुआ कि कौन धारण करेगा यह जहर ? सभी की नज़र भगवान शिव पर ही अटकी थी, लेकिन सब संशंकित थे कि बाबा ने अगर मना कर दिया तो क्या होगा ? ।।

भगवान विष्णु आगे आये और भोलेनाथ से निवेदन किया – हे भगवन् ! लोक कल्याण के लिये यह हलाहल आप ही धारण करें । सभी की निवेदन से भगवान भोलेनाथ ने प्याला उठाया और पी लिया उस जहर को । बाबा ने कण्ठ में ही उसे धारण किया और भक्त प्रेम से पुकार उठे – “जय हो नीलकण्ठ महादेव की !” लोकोक्ति है कि उस जहर के ताप से भगवान भोले नाथ भी बावले हो उठे । परन्तु शिव तो लीलाधारी हैं, कब कैसी लीला करेगें वे ही जानते है । सागर एवं पर्वत मालाओं को लाँघते-लाँघते बाबा नीलकंठ हिमालयखण्ड में आ बैठे ।।

वहीं पर देवताओं ने गंगाजल के द्वारा उनका महाभिषेक किया और तब से नीलकण्ठ महादेव प्रतिष्ठापित हो गये । सबसे पहले देवताओं ने ही महादेव का महाभिषेक और महाश्रृंगार किया था । रावण भी भगवान शंकर का अभिषेक गंगाजल से करता था । यहाँ तक कि अभिषेक के लिये अपनी लंका नगरी में उसने गंगाजल का कुण्ड बना दिया था जहां से वह स्वयं जल लाकर शिव का अभिषेक करता था । रामायण में प्रसिद्ध है कि युद्ध के समय भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने शिवजी की प्रसन्नता के लिये शिवलिंग स्थापित कर स्वयं अपने करकमलों से अनेक तीर्थों से लाये गये पवित्र जल के द्वारा "रामेश्वर ज्योर्तिलिंग" का महाभिषेक किया और रावण के ऊपर विजय प्राप्त की । उसी की स्मृति में आज भी लोग गोमुख से रामेश्वरम् तक की कठिन पैदल यात्रा करके गोमुख से लाये गये जल को भगवान "रामेश्वर" को अर्पित कर अपना जीवन धन्य बनाते हैं ।।

एक बार संत एकनाथ जी गंगोत्री से गंगाजल भरकर यानि "काँवर उठाकर" रामेश्वर की ओर पैदल यात्रा करते हुये ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ पानी का अत्यन्त अभाव था । उनके साथ में कई संगी-साथी भी थे । उसी रास्ते में बिन पानी के एक गदहा तड़प रहा था । लोग उसे देखते और आगे निकल जाते । एकनाथजी उस रास्ते से जाते समय यह नज़ारा देखकर शास्त्रों की, संतो की यह बात याद करने लगे कि हर प्राणी में शिव का वास है ।।

यह देह ही देवालय है और इस देह में यह चेतन देव ही शिव है । जब गदहे के रुप में यह चेतन देव तड़प रहे हैं तो इन्हें छोड़कर मैं रामेश्वर कैसे जा सकता हूँ ? मैं तो अपने शिव को यहीं मनाऊँगा । ऐसा सोचकर वे हर-हर महादेव कहते हुए समस्त गंगाजल उस मृततुल्य गदहे के मुँह में डाल दिए । वहां चमत्कार यह हुआ कि उसी गदहे के मुख में उन्हें भगवान भोलेनाथ का दर्शन हो गया । सारी मनोकामनायें पूर्ण हो गयीं । किसी प्राणी का अपमान करके किया हुआ पूजन कभी सफल नहीं होता है । किसी पीड़ित की उपेक्षा करना शिव का ही अपमान है ।।

।। नारायण सभी का कल्याण करें ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

Thursday, July 16, 2015

ब्राह्मण बनना हो तो संतुष्टि के साथ तपस्वी जीवन व्यतीत करना होगा तो ही इस विद्या को पढ़ो और ब्राह्मण बनो ।। Sansthanam.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, कई बार लोगों को ये समझ ही नहीं आता की उनको क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए ? इसी वजह से लोग धन की इच्छा से भी आध्यात्मिक साधना में लग जाते हैं, जो गलत मार्ग पर आगे चलते-चलते भटक जाते है और हमारे धर्म की भी बदनामी करवाकर स्वयं भी डूब जाते हैं ।।

कई बार मैं देखता हूँ, तो मुझे लगभग ये आभास होता है, कि ये इन्सान धन का लोभी है और बातें बड़ी से बड़ी साधन-साधना की करता है । मुझे ये नहीं पता मुझे ऐसा क्यों आभास होता है, हो सकता है मेरे विचार ही अच्छे न हों । पर एक बात तो परम सत्य है और उसे सभी को स्वीकारना ही होगा की तत्त्वज्ञान लोकभोग्य के लिए नहीं होता ।।

कभी-कभी देखता हूँ, लोग टीवी पर बैठकर पानी-पूरी खाने की सलाह देते हैं और कहते हैं की ये हमारे अन्दर से ज्ञान प्रकट हुआ है, तुम्हारा कल्याण हो जायेगा । चलचित्रों में धर्म की ऊँची-से-ऊँची बाते मजाक करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है और आज की हमारी युवा पीढ़ी उसको बिना समझे हँसकर उड़ा देती है ।।

तत्त्वज्ञान को लोकभोग्य की वस्तु बनाकर रखना हो तो स्वाभाविक है कई बार लोग मनमाने हो ही जाते हैं । अक्स़र हमारे गुरूजी कहा करते थे, कि बेटा अगर धन कमाना हो तो नौकरी करनेवाली विद्या अथवा व्यापार करनेवाली बानिये वाली विद्या पढ़ो । क्योंकि ब्राह्मण बनना अर्थात् संतुष्टि के साथ तपस्वी जीवन व्यतीत करना हो तो ही इस विद्या को पढ़ो ।।

सेवा करने वाला सामने वाले का अगर गुण और दोष देखेगा तो सेवा क्या ख़ाक करेगा । हम नि:स्वार्थ भाव से अपना कर्म करते जाएँ तो फल देनेवाला भगवान है, अवश्य ही देगा । और अगर हमें ही जब भगवान पर भरोसा नहीं होगा तो फिर हम क्या ख़ाक दूसरों को भरोसा दिलवाएंगे । इसलिए हमें यज्ञार्थ कर्म करने की आवश्यकता है और वो भी नि:स्वार्थ । अपना कर्त्तव्य कर्म करते जाओ देनेवाला उपर बैठा है ।।


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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।। नारायण नारायण ।।

Wednesday, July 15, 2015

ब्रह्मतत्त्व को जानने अथवा ब्रह्मसत्ता को पाने का सहज मार्ग ।। Sansthanam.

जय श्रीमन्नारायण,
मित्रों, हम धनवान होंगे या नहीं, यशस्वी होंगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है । लेकिन हम मरेंगे या नहीं इसमें कोई शंका है ? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परन्तु इस जीवन की गाड़ी के छूटने का कोई निश्चित समय है ?

आज तक आपने या हमने इस जगत में जो कुछ भी जाना है, जो कुछ भी प्राप्त किया है अथवा आज के बाद हम जो भी जानंगे और प्राप्त करेंगे, वह सब मृत्यु के एक ही झटके  में छूट जाएगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी । अतः अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लें तो फिर तो जीव ही अविनाशी हो जाता है ।।

हमें अपने भीतर सोये हुए निश्चय बल को जगाना होगा, किसी भी देश, किसी भी काल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करना होगा । हमारी आत्मा में अथाह सामर्थ्य है । परन्तु अपने को हम अगर दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो जीव को ऊपर उठा सके । हाँ अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाने पर तो त्रिलोकी में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो हमें दबाये रख सके ।।

हमें सदा स्मरण रखना है, कि इधर-उधर भटकती हुई हमारी वृत्तियाँ जो हमें केवल भटका रही हैं । उनके चक्कर में पड़कर बहकना नहीं, अपितु अपनी तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाना होगा और केवल साधन काल में ही नहीं अपितु संसार के व्यवहार-काल में भी जो कार्य करते हैं उसमें भी अपनी वृत्तियों को एकाग्र रखना होगा ।।

एकाग्रचित्त होकर कोई भी कार्य जब हम करते हैं, तो उसका परिणाम सफलता ही होता है, फिर चाहे वो कोई भी कार्य क्यों न हो । सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करना, विचारशील एवं प्रसन्नचित्त रहने का प्रयास करना । जीवमात्र को अपना ही स्वरूप समझना, सबसे स्नेह रखना, दिल में सभी के लिए प्रेम रखना, यही सर्वोत्कृष्ट साधना है । इसके अलावा आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरूषों का सत्संग श्रवण करना एवं सत्साहित्यों के पठन-पाठन से जीवन को आनन्दित रखने का सतत् प्रयास करना, यही ब्रह्मतत्त्व को जानने अथवा ब्रह्मसत्ता को पाने का सहज मार्ग है ।।

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नारायण सभी का नित्य कल्याण करें ।। नारायण नारायण ।।

Saturday, July 11, 2015

पुरुषोत्तम मास में भगवान श्री हरि नारायण की साधना का सहज मार्ग ।। the purushottam month search for the God. Sansthanam.com

जय श्रीमन्नारायण,


पुरुषोत्तम मास में भगवान श्री हरि नारायण की साधना का सहज मार्ग ।।
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शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं ।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।

मित्रों, भगवान श्री हरि के अवतार मानव कल्याण के लिए ही होता है । भगवान श्री कृष्ण के स्वरुप में हरि का पूर्ण योगेश्वर, भक्ति, शक्ति, पराक्रम तथा नीतियों का साक्षात संगम हैं । पुरुषोत्तम मास में भगवान् श्री हरि की उपासना या योगेश्वर कृष्ण की साधना का एक ही प्रतिफल मिलता है ।।

कृष्ण का स्वरुप आज से पाँच हज़ार वर्ष पूर्व जितना सार्थक था आज भी उतना ही है । कृष्ण का जीवनचरित्र बालपन से लेकर निर्वान तक हर कदम पर रस, योग, प्रेम, माया तथा नीति आदि से ओतप्रोत रहा है । उनके जीवन की हर घटना हम मानवों के लिए प्रेरणादायक है, वे साक्षात परब्रह्म हैं । उन्होंने अपने जीवन में कभी भी कर्म की राह नहीं छोड़ी व जीवन को पूर्ण आनंद और वैभव के साथ हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया ।।

इसलिए कहा जाता है, कि सबसे बड़ा योगी तो गृहस्थ ही होता है जो इतने बंधनों को सँभालते हुए भी जीवन की यात्रा सहजता से करता है । अपने गृहस्थ जीवन के सभी दायित्वों को निभाते हुए साधना भी करना तथा प्रभु तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करना ये बहुत बड़ा योग है ।।

मित्रों, वैसे तो श्री हरि साधना श्वास-श्वास करने को बताया गया है हमारे शास्त्रों में । परन्तु पुरुषोत्तम मास में धन, धर्म, युक्ति, भुक्ति, मुक्ति तथा जीवन का आनन्द भी चाहिए उसे श्री युक्त हरि यानी नारायण साधना करनी चाहिए । इस मास में विशेष रूप से इस विधि के अनुसार भगवान नारायण का पूजन करें तो हर प्रकार की मनोकामना पूर्ण होती है । चांदी के समतल पत्र पर श्री यंत्र बना हो उस पर भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा उसी श्री यंत्र के ऊपर ही स्थापित करें । लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर कुमकुम से स्वास्तिक बनायें । उस पर श्रीयन्त्र के उपर नारायण की प्रतिमा उपरोक्त विधि से स्थापित करें ।।

भगवान् नारायण की प्रशन्नता हेतु कुछ आवश्यक निर्देशों का पालन आवश्यक होता है । जैसे पुरे माह १ समय वो भी सात्विक भोजन ग्रहण करें, पीले वस्त्र, पीला आसन, उत्तर दिशा, ब्रहमचर्य, भूमिशयन इत्यादि नियमों के पालन के साथ इस साधन को करना चाहिए । पूजा के लिए केसर, गंगाजल, अष्टगंध, घी का दीपक, कमल के फूल यदि मिल जाएँ तो, वर्ना पीले पुष्प की पंखुडियां और भोग हेतु खीर का प्रयोग करें । प्रातः ५ से ६ के बीच और और संध्या काल में १० बजे के पहले इस साधना को करना चाहिए ।।


अथ ध्यानम् :-

मंगलम भगवान् विष्णु, मगलम गरुडध्वज: ।
मंगलं पुण्डरीकाक्षो    मंगलाय तनो हरि: ।।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस मन्त्र की ११ माला जप करें । फिर विष्णुसहस्त्रनाम के १, ५, ७, या ११ पाठ करें । इस साधना में  विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ अति आवश्यक अंग है, जो कि किसी भी पूजा शॉप पर सरलता से मिल जाता है या नेट पर भी उपलब्ध है । यह साधना अति ही सरल तथा शीघ्र फलदायी भी है । जो जिस भाव से इस साधना को संपन्न करता है, उसे उसी भाव के अनुसार फल भी मिलता ही है । अतः साधना करें और अनुभव करें बाकी नारायण की कृपा ।।

।। नमों नारायण ।।

शास्त्रानुसार एकादशी व्रत करने की विधिवत विधि क्या है, कैसे एकादशी व्रत को करें ? उस दिन क्या करें क्या न करें ?।। Ekadashi Vrat Ki Vidhi. Sansthanam

शास्त्रानुसार एकादशी व्रत करने की विधिवत विधि क्या है, कैसे एकादशी व्रत को करें ? उस दिन क्या करें क्या न करें ?।। Sansthanam.com

मित्रों, कल पुरुषोत्तमी एकादशी का व्रत है, जो लोग इस व्रत को करते हैं, उनके लिए शास्त्रानुसार एकादशी व्रत की विधिवत विधि बताता हूँ । जो लोग इस व्रत को करते हैं, उन्हें दशमी तिथि की रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग विलास से भी दूर रहना चाहिए । प्रात: एकादशी को लकड़ी का दातुन करना चाहिए तथा पेस्ट आदि का उपयोग न करें । नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ शुद्ध कर लें इससे भी दातुन की विधि पूर्ण हो जाती है । वैसे तो किसी भी वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है, इसलिए स्वयं गिरे हुए पत्तों का ही सेवन करना चाहिए ।।

यदि ये सम्भव न हो तो पानी से बारह कुल्ले कर लें । फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें अथवा किसी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण के मुख से श्रवण करें । प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि: ‘आज मैं चोर, पाखण्डी और दुराचारी मनुष्य से बात नहीं करुँगा और न ही किसी का दिल दुखाऊँगा । गौ, ब्राह्मण आदि को फलाहार व अन्नादि देकर प्रसन्न करुँगा । रात्रि को जागरण कर कीर्तन करुँगा ।।

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" इस द्वादशाक्षर मंत्र अथवा गुरुमंत्र का जप करुँगा, राम, कृष्ण, नारायण इत्यादि विष्णुसहस्रनाम को कण्ठ का भूषण बनाऊँगा । ऐसी प्रतिज्ञा करके श्रीविष्णु भगवान का स्मरण कर प्रार्थना करें कि "हे त्रिलोकपति ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति अवश्य दें ।" मौन, जप, शास्त्रों का पठन-पाठन, कीर्तन, रात्रि जागरण एकादशी व्रत में विशेष लाभ प्रदायक उपाय हैं ।।

एकादशी के दिन अशुद्ध द्रव्य से बने पेय न पीयें, जैसे - कोल्ड ड्रिंक्स, एसिड आदि डाले हुए फलों के डिब्बाबंद रस आदि को न पीयें । फलाहार भी दो बार से ज्यादा न करें तथा आइसक्रीम व तली हुई चीजें जैसे फलाहारी भुंजिया और चिप्स इत्यादि न खायें । फल अथवा घर में निकाला हुआ फल का रस या थोड़े दूध या जल पर रहना विशेष लाभदायक होता है । व्रत के (दशमी, एकादशी और द्वादशी) इन तीन दिनों में काँसे के बर्तन, मांस, प्याज, लहसुन, मसूर, उड़द, चने, कोदो (एक प्रकार का धान), शाक, शहद, तेल का सेवन तथा ज्यादा जल का भी सेवन नहीं करना चाहिए ।।

व्रत के पहले दिन (दशमी को) तथा व्रत के दूसरे दिन (द्वादशी को) हविष्यान्न (जौ, गेहूँ, मूँग, सेंधा नमक, कालीमिर्च, शर्करा और गोघृत आदि) का बना भोजन सिर्फ एक बार ही ग्रहण करें । फलाहारी को गोभी, गाजर, शलजम, पालक, कुलफा का साग इत्यादि सेवन नहीं करना चाहिए । आम, अंगूर, केला, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करना चाहिए । जुआ, निद्रा, पान, परायी निन्दा, चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध तथा झूठ, कपटादि अन्य कुकर्मों से नितान्त दूर रहना चाहिए एवं बैल की पीठ पर सवारी कदापि न करें ।।

भूलवश किसी निन्दक से बात हो जाय तो इस दोष को दूर करने के लिए भगवान सूर्य के दर्शन तथा धूप दीप से श्रीहरि की पूजा करके क्षमा माँगनी चाहिए । एकादशी के दिन घर में झाडू नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इससे चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है । इस दिन बाल नहीं कटावाना, मधुर बोलना, अत्यधिक न बोलना क्योंकि अधिक बोलने से न बोलने योग्य वचन भी निकल जाते हैं । व्रत के दिन सत्य ही बोलना चाहिए । इस दिन यथाशक्ति अन्नदान करें किन्तु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न कदापि ग्रहण न करें । प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करनी चाहिए ।।

एकादशी के दिन किसी सम्बन्धी की मृत्यु हो जाय तो उस दिन व्रत रखकर उसका फल संकल्प करके मृतक को देना चाहिए और श्रीगंगाजी में पुष्प (अस्थि) प्रवाहित करने पर भी एकादशी व्रत रखकर व्रत का फल प्राणी के निमित्त दे देना चाहिए । प्राणिमात्र को अन्तर्यामी का अवतार समझकर किसी से छल कपट नहीं करना चाहिए । अपना अपमान करने या कटु वचन बोलनेवाले पर भी भूलकर भी क्रोध नहीं करना चाहिए । सन्तोष का फल सर्वदा मधुर ही होता है इसलिए मन में सदैव दया का भाव रखना चाहिए । इस विधि से व्रत करनेवाला उत्तम फल को प्राप्त करता है ।।

व्रत खोलने की विधि :- द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्टान्न, दक्षिणादि से प्रसन्न कर उनकी परिक्रमा करनी चाहिए । फिर पूजा स्थल पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हो गये इस भावना के साथ, सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत को खोलना चाहिए ।।