जय श्रीमन्नारायण,
Swami Dhananjay Maharaj.
१.इस संसार में कुछ प्राणियों के किसी विशेष अंग में विष होता है ! जैसे सर्प के दांतों में, मक्खी के मस्तिष्क में, और बिच्छू की पुँछ में ! पर इन सबसे अलग दुर्जन और कपटी मनुष्य के हर अंग में विष होता है ! उसके मन में विद्वेष, वाणी में कटुता और कर्म में नीचता का व्यवहार, जहर बुझे तीर की तरह दूसरे को त्रास
देते हैं !!२.किसी भी व्यक्ति को वह स्थान भी त्याग देना चाहिए, जहाँ आजीविका न हो ! क्योंकि आजीविका रहित मनुष्य, समाज में किसी सम्मान के योग्य नहीं रह जाता !!
३.हर मनुष्य को सभी विद्याओं में निपुण होना चाहिऐ ! बडे लोगों से विनम्रता, विद्वानों से श्रेष्ठ और मधुर ढंग से वार्तालाप का तरीक सीखना चाहिए ! जुआरियों से झूठ बोलना और कुशल स्त्रियों से चालाकी का गुण सीखना चाहिए !!
४.लेकिन मनुष्य को ऐसे कर्म करना, चाहिए जिससे उसकी कीर्ति सब और फैले ! विद्या, दान, तपस्या, सत्य भाषण और धनोपार्जन के उचित तरीकों से कीर्ति दसों दिशाओं में फैलती है !!
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५.अपना जीवन शांतिपूर्वक बिताने के लिए हर मनुष्य को धर्म-कर्म का अनुष्ठान करते रहना चाहिए ! लेकिन यज्ञादि, हर मनुष्य के लिए आवश्यक कर्म है ! क्योंकि वह घर मुर्दाघर के समान हैं, जहाँ धर्म-कर्म या यज्ञ-हवन नहीं होता ! जहाँ वेद शास्त्रों का उच्चारण नहीं होता, विद्वानों का सम्मान नहीं होता और यज्ञ-हवन से देवताओं का पूजन नहीं होता ऐसे घर, घर न रहकर शमशान के समान हो जाते हैं !!!
ऐसा हमारे महान दार्शनिक - आचार्य चाणक्य का मानना है, जो मेरे अनुभव में भी सत्य बैठता है ! तथा आप भी अपना अनुभव अवश्य बताएं !!!
!!!! नमों नारायण !!!!
!!!! नमों नारायण !!!!

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